Wednesday, 2 September 2020

Accident essay in Hindi - दुर्घटना पर निबंध

Accident essay in Hindi - दुर्घटना पर निबंध


Accident essay in Hindi


आदि काल से व्यक्ति बाढ़, भूकंप, तूफान, जंगल की आग, उल्कापात आदि प्राकृतिक आपदाओं का शिकार बनता रहा है। आज के वैज्ञानिक युग में वैज्ञानिक प्रगति भी उसके लिए कम समस्याएं लेकर नहीं आई है। विभिन्न प्रकार की औद्योगिक दुर्घटनाएं आज आम बात हो गई है।

सड़क, रेल व वायुयान दुर्घटनाओं में असंख्य लोग हर रोज मारे जाते हैं। 19 अक्टूबर 2018 को अमृतसर के पास दशहरे के अवसर पर रावण दहन के दौरान पास से गुजर रही रेलगाड़ी से कटकर का 61 लोगों की मौत हो गई एक या दो नहीं पूरे 61 लोगों की मौत हो गई। कौन है इस दुर्घटना का खलनायक कोई भी इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं दिखा। सब अपना बचाव करने में और दूसरों को दोषी ठहराने में लगे हुए हैं किंतु कोई तो है जो इसके लिए उत्तरदाई है इस भयानक दुर्घटना के लिए उत्तरदाई खलनायक को खोजना तो होगा ही।

जब यह दुर्घटना घटी तब वहां रावण दहन किया जा रहा था रावण की जलते हुए पुतले को गर्मी और पटाखों के शोर और धुएं से बचने के लिए ही लोग रेल की पटरियों की ओर जाने को विवश हुए अत्याधिक का शोर के कारण ना तो लोगों को ही रेलगाड़ी की आवाज सुनाई पड़ी और ना अत्यधिक शोर और रावण के जलने व पटाखों के धुएं के कारण रेल गाड़ी के ड्राइवर को ही कुछ आभास हो पाया और अचानक यह हादसा हो गया। इस भयानक दुर्घटना के लिए पटाखे और उनसे उत्पन्न प्रदूषण काफी हद तक उत्तरदाई है इसमें संदेह नहीं। अब प्रश्न उठता है कि इन पटाखों और उनसे उत्पन्न प्रदूषण के लिए कौन उत्तरदाई है? उत्तर स्पष्ट है इसके लिए कोई और नहीं हम खुद उत्तरदाई हैं जब हमें पता है कि आग जला सकती है तो फिर भी हम आग से क्यों खेलते हैं ? आतिशबाजी के दुष्परिणामों पर रोज पढ़ते लिखते हैं लेकिन असर बिल्कुल नहीं होता धार्मिक स्थलों पर अथवा धार्मिक आयोजनों के दौरान दुर्घटनाएं होना आम बात हो गई है जिनमें सैंकड़ों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं लेकिन हम फिर भी इनसे सबक नहीं लेते।

फिर हमें और फिदाईन में क्या फर्क रह गया ? कोई अवसर हो, हम पटाखे चलाने से बाज नहीं आते जबकि हम जानते हैं कि यह बहुत घातक है इनसे बच्चों, बूढ़ों और बीमारू को ही परेशानी नहीं होती सामान्य व्यक्ति भी परेशान होता है पटाखों के कारण दुर्घटनाएं होना आम बात है जीव-जंतु सब परेशान होते हैं और प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है कब हमें होश आएगा जा आएगा ही नहीं कब आयोजक अपनी गलतियों को सुधारेंगे ? कब प्रशासन और सरकार कारगर कदम उठाएगी ? जब सब कुछ सवा हो जाएगा तब ?

किसी दुर्घटना की जिम्मेदारी दूसरे पर डाल देना समस्या का समाधान नहीं। पटाखों के बनाने पर प्रतिबंध नहीं लेकिन चलाने पर आंशिक प्रतिबंध है यह कौन सी नीति हुई और हम तो नियम तोड़ने में माहिर हैं हैं ऐसे में दुर्घटना के बाद चिल्लाने से क्या हासिल होगा समय रहते हमें अनुशासित होना होगा तभी बात बनेगी।

धार्मिक आयोजनों और उत्सवों में लोग अपना संयम ही नहीं विवेक भी खो बैठते हैं यदि ऐसे आयोजनों में पहले से ही अधिक भीड़ है तो वापिस क्यों नहीं चले आते ? अपनी सुरक्षा का स्वयं पूरा ध्यान रखना चाहिए दुर्घटना होने पर यदि किसी अन्य का दोष है तो भी दुर्घटना के बाद उसे दोष देने से क्या हासिल होगा सरकार थोड़ा बहुत मुआवजा दे भी देगी तो क्या उसे परिवार के बिछड़े सदस्य वापस आ जाएंगे .


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