Wednesday, 2 September 2020

Essay on Bhagat Singh in Punjabi शहीद भगत सिंह पर निबंध

Essay on Bhagat Singh in Punjabi Hindi - भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 में पंजाब के ज़िला लायलपुर गाँव खटकड़ कलां में हुआ (जो अब पाकिस्तान में है ) एक सिख भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 में पंजाब के ज़िला लायलपुर गाँव खटकड़ कलां में हुआ (जो अब पाकिस्तान में है ) एक सिख परिवार में हुआ था उनकी माता जी का नाम विद्यावती कौर था और पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह था। भगत सिंह की दादी ने उनका नाम भागो वाला रखा था। जिसका अर्थ है अच्छे भागों वाला बाद में आपको भगत सिंह के नाम से जाना जाने लगा।

Essay on Bhagat Singh in Punjabi




उनके जीवन का मात्र एक उदेश्य था भारत माता को अंग्रेजों से आज़ाद कराना जिसके लिए उन्होंने घर छोड़ दिया और दिल्ली चले गए वहां उनकी मुलाकात चंद्र शेखर आज़ाद से हुई। 13 अप्रैल 1919 को जिलियांवाले बाग़ की घटना का भगत सिंह पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा । तब उन्होंने उस बाग़ की खून से रंगी मिट्टी को अपने माथे पर लगाकर एक बोतल में रख लिया था और इस घटना का बदला लेने की शपथ ली थी। उस समय भगत सिंह मात्र 12 साल के थे।

सन 1928 में साईमन कमिशन के भारत आने पर भारतीय लोगों द्वारा जलूस निकला गया। लाला लाजपत राय के नेतुत्व में इस कमिशन का विरोध किया गया। इस जलूस में लाला जी पर लाठी चार्ज भी किया गया इन लाठियों के प्रहार से लाला जी की मौत हो गयी तो भगत सिंह आज़ाद जैसे देश भगत गुस्से में आ गए और भगत सिंह से अपने साथियों की मदद से अंग्रेज पुलिस अधिकारी सांडर्स को गोलियों से उड़ा दिया और इस तरह भगत सिंह और उनके साथियों ने लाला जी की मौत का बदला लिया।

सन 1929 को भगत सिंह और उनके क्रातिकारी साथियों ने असेम्बली में बम फेंके । उनके असेम्बली में बम फेंकने का मुख्य उदेश था जालिम सरकार को उनके कार्यों के प्रति जानू कराना। इस घटना के बाद तीनों ने आपने आप गिरफ्तारियां दे दीं। तीनों पर मुक़दमा चलाया गया।

सांडर्स की हत्या करने और बम केस के आरोप में सन 31मार्च 1931 की रात को भगत सिंह ,सुखदेव सिंह ,राजगुरु को लाहौर की जेल में फांसी दी गई। धन हैं वे महान शहीद यो फांसी के तख्ते पर हंसते -हंसते झूल गए। इन तीनों की शहीदी देश के लये आज़ादी का पैगाम लेकर आई इन देश भक्तों की शाहीदी से आज़ादी का संग्राम और भी तेज़ हो गया 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ ...
सरदार भगत सिंह और उनके साथियों का जीवन आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है उन जैसे देश भगतों के बलिदान और त्याग के फलसरूप भारत ने स्वतंत्रता हासिल की।

Essay on Bhagat Singh in Punjabi Hindi 1000 Words

भगत सिंह भारत के एक ऐसे महान योद्धा रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन देश की आज़ादी के लिए बिना कोई स्वार्थ के देश को ब्रिटिश साम्राज्य की जंजीरों से मुक्त कराया और मात्र 23 वर्ष की उम्र में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए

भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को हुआ था वे सरदार किशन सिंह और विद्द्यावती के पुत्र थे। उनके जन्म के दिन ही उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह जेल से रिहा हुए थे जिस कारण इस बच्चे का नाम भगत सिंह रखा गया था। लोग आपको भागोवाला कहकर पुकारते थे।
भगत सिंह को बचपन से ही पढ़ाई -लिखाई का बहुत शौंक हुआ करता था अपनी कक्षा में वह अन्य छात्रों से आगे थे। पढाई के इलावा भगत सिंह में देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी थी।

13 अप्रैल 1919 का दिन, अमृतसर के जिलियांबाले बाग़ में बैसाखी के पावन पर्व पर हजारों लोग इकट्ठे हुए जिनमें से महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। उस दिन एक बहुत ही दुखदायक घटना घटी। जनरल डायर नाम के एक अंग्रेज अधिकारी ने बाग़ पर मौजूद सभी लोगों पर गोलियां चलाने का हुक्म दे दिया उस समय वहां खून की नदियाँ बहने लगीं थी हजारों लोग मारे गए। उस वक्त भगत सिंह की उम्र मात्र 12 वर्ष थी इस घटना से उनके मन को गहरा धक्का लगा।

जो जनता जिलियांबाले बाग़ में इकट्ठी हुई थी उनके पास कोई हथियार भी नहीं थे , उस स्थान से निकल भागने का कोई रास्ता भी नहीं था ऐसे में वहां मौजूद लोग अंग्रेज सेनिकों की गोलियों से मारे गए। इस प्रकार यह घटना बालक भगत सिंह के मन में गहरा असर कर गयी  ऐसे में उनका खून खोल चुका था और उन्होंने घटना वाले स्थान की मिट्टी को उठाकर अग्रेजों से बदला लेने का प्रण लिया।

घर छोड़ने से पहले भगत सिंह के एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने लिखा था "मेरे जीवन का लक्ष्य भारत की आज़ादी के लिए लड़ना है "मुझे संसारिक सुख की कोई चाह नहीं है मैंने देश के लिए बलिदान देने की शपथ ली है और में देश की सेवा के लिए घर छोड़ रहा हूं।

इसके बाद भगत सिंह घर से भागकर कानपुर आ गए थे वहां कुछ दिनों तक वह अखबार बेचने का काम करते थे और वहां उनकी मुलाकात गणेश शंकर से हुई। इन्ही दिनों नौजवान भारत सभा का गठन किया गया था।
आज़ादी की इस जंग में सन 1925 में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया। इसमें चन्द्रशेखर आजाद , राम प्रसाद , अशफाक उल्ला खां और रोशन सहित कई क्रांतिकारियों ने लखनऊ से कुछ मील की दूरी पर काकोरी नाम के स्थान पर ट्रेन में ले जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया जो हिन्दुस्तानियों के खून पसीने की कमाई थी जिन पर अंग्रेजों का कब्जा था लुटे गए खजाने का प्रयोग क्रन्तिकारी हथियार खरीदने के लिए करना चाहते थे। इतिहास में यह घटना काकोरी काण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुई।

काकोरी काण्ड में गिरफ्तार हुए चार क्रातिकारियों को मौत की सज़ा सुनाई गयी अन्य को उम्र कैद की सजा सुनाई गयी किन्तु इन सभी में चन्द्रशेखर आजाद भागने में कामयाब रहे। इस खबर से भगत सिंह को क्रांति की जंग के धधकते अंगारे में बदल दिया।

सन 1928 में जब साईमन कमिशन भारत आया तो लोगों ने उनके विरोद्ध में लाल लाजपत राय के नेतुत्व में एक बाहरी जलूस निकाला इतने बड़े विरोध को देखते हुए ब्रिटिश अधिकारी घबरा गए और उन्होंने भीड़ पर लाठी चार्ज कर दिया जिसमें लाला लाजपत राय की मौत हो गयी। यह खबर भगत सिंह के लिए किसी सदमें से कम नहीं थी उन्होंने उसी वक्त लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने का निश्चय किया। आप राजगुरु , सुखदेव और चन्द्रशेखर आजाद के साथ मिलकर सांडरस की हत्या करने की योजना बनाई। इस योजना के तहत भगत सिंह और उनके साथियों ने मिक्लर सांडर्स की हत्या कर दी इस घटना से भगत सिंह पूरे देश में एक क्रांतिकारी के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

इस घटना के बाद भगत सिंह वहां से कलकत्ता चले गए वहां रहते हुए भगत सिंह ने बम बनाने की विधि को सीखा भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव सिंह का यह मानना था के पराधीन भारत की बेडियां अहिंसा की नीतियों से नहीं काटी जा सकती हैं इसी कारण भगत सिंह और उनके साथ बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेम्बली के अंदर बम फेंक दिया आप वहां भागने की वजाय इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे क्योंकि उनका बम फेंकने का इरादा किसी की जान लेना नहीं था ब्रिटिश सरकार को उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना था इसके बाद भगत सिंह और उनके साथी ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया। बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काले पानी की जेल की सजा सुनाई गयी

जेल में भगत सिंह 2 वर्ष तक रहे इस दौरान वह जेल में ही लिखकर अपने क्रन्तिकारी विचार व्यक्त करते थे इस दौरान भगत सिंह व उनके साथियों ने भूख हडताल कर डी भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों पर लाहौर षडयंत्र का मुकदमा भी चलाया गया।

बम फेंकने के अपराध में भगत सिंह , राजगुरु , और सुखदेव को 7 अक्टूबर 1930 को फांसी की सजा सुनाई गयी , फांसी के लिए 24 मार्च 1931 को सुबह, मृत्यु दंड के लिए दिन तय किया गया किन्तु उस वक्त देशभर में अंग्रेज हकूमत का पूरा विरोध हो रहा था जिस से अंग्रेजों को खतरा महसूस होने लगा और उन्होंने 23 मार्च की मध्य रात्रि को ही इन वीरों को फांसी पर लटका कर शहीद कर दिया और रात के अँधेरे में ही सतलुज नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया .

"सर फरोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजू ए कातिल में है"

शहीद ए आजम सरदार भगत सिंह का जीवन आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का श्रोत है , इन महान देश भगतों के बलिदान से ही भारत को आज़ादी हासिल हुई और इन महान वीरों का नाम इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर रहेगा।
_____________________________________________________

Bhagat Singh essay Punjabi 600 words

"वे मुझे मिटा सकते हैं किन्तु वे मेरे विचारों को नहीं मिटा सकते
वे मेरे शरीर को नष्ट कर सकते हैं पर मेरी आत्मा को नष्ट नहीं कर सकते हैं"

ये महान शब्द भारत के शूरवीर शहीद भगत सिंह के हैं, “शहीद ऐ आजम” कहलाने वाले भगत सिंह ने भारत का भाग्य रचने में एहम भूमिका निभाई है।

27 सितम्बर 1907 को भगत सिंह का जन्म विद्द्यावती की कोख से हुआ , पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह था उनका परिवार बहादुरी और साहस के लिए जाना जाता था और सरदार किशन भी एक सच्चे क्रांतिकारी थे अपने समय में उन्होंने अंग्रेज सरकार की जेल यातना भी सही। भगत सिंह अपने माता-पिता की दूसरी संतान थे सरदार किशन सिंह के बड़े लड़के का नाम जगत सिंह था जिनका अवसान मात्र 11 वर्ष की आयु में हो गया था। किशन सिंह के चार पुत्र और तीन पुत्रियां थीं। देश प्रेम की भावना भगत सिंह को घर-परिवार से विरासत में हासिल हुई थी उनके बाबा सरदार अर्जुन सिंह भी अंग्रेज सरकार के घोर विरोधी थे।

5 वर्ष की छोटी सी आयु में भगत सिंह के खेल भी अजीब हुआ करते थे वह अपने साथियों की दो टोलियां बनाकर एक दुसरे पर आक्रमण कर खेल खेल में युद्ध का अभ्यास किया करते थे। इसीलिए भगत सिंह के हर काम में वीरता की झलक दिखाई देती थी।

भगत सिंह वास्तव में तीव्र बुद्धि के बालक थे वे अपना लेसन बड़ी ही जल्दी याद कर लेते थे इसके इलावा वह दुसरे छात्रों की अपेक्षा साहसी तथा स्पष्ट बोलने वाले थे। 14 वर्ष की आयु से ही सरदार भगत सिंह PUNJAB की क्रन्तिकारी संस्थाओं में भाग लेने लगे थे। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उनकी शादी की तैयारियां आंरभ होने लगीं किन्तु आपको ये मंजूर नहीं था और आप घर से भागकर कानपुर आ गए। इसके बाद तो आप देश की आज़ादी के लिए ऐसे जुट गए के अपना पूरा जीवन ही देश को समर्पित कर डाला। भगत सिंह ने अपना साहस दिखाते हुए ब्रिटिश सरकार का डटकर सामना किया और अंग्रेज सरकार के छक्के छुड़ा दिए।

सन 1928 में साईमन कमिशन के खिलाफ भारी जलूस निकाला गया इस जलूस में हुए लाठी चार्ज से लाला लाजपत राय की मौत हो गयी और इस मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह ने अपने साथी राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को सांडरस को गोलियों से भून दिया। इसके बाद 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंक दिए जिसका उदेश्य सोयी हुई अंग्रेज सरकार की आंखें खोलना था भगत सिंह और उनका साथी वहां से भाग सकते थे किन्तु उनका इरादा वहां से भागने का नहीं था।

भगत सिंह और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया यहां पर सभी क्रांतिकारियों ने मिलकर जेल में भूख हडताल कर दी इस हडताल में यातिन्दर्नाथ नाम के एक क्रन्तिकारी की मौत हो गयी। भगत सिंह जेल में बैठकर अपने विचार लिखा करते थे जिनमें से में नास्तिक हूं ये सबसे लोकप्रिय शब्द था।

इसी तरह भारत के इन महान शूरवीर योद्धों को भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 वाले दिन फांसी दे दी गयी वह हंसते हंसते फांसी पर झूल गए। फांसी का दिन तो 24 मार्च को रखा गया था किन्तु उस वक्त भारती जनता में इतना आक्रोश भर गया था के वह भगत सिंह और उनके साथियों की रिहाई कि मांग कर रहे थे इसीलिए अंग्रेज सरकार ने जनता के डर से 23 मार्च की रात्रि को ही उन्हें फांसी दे दी गयी।
____________________________________________

Essay on Bhagat Singh - 400 words

23 मार्च, 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया। कहा जाता हैए के मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह तय की गयी थी किन्तु उस वक्त भारत की जनता में आज़ादी को लेकर इतना ज्यादा आक्रोश भर गया था के अंग्रेजों ने डर के कारण 23 मार्च की रात्रि को ही इन तीन वीर सपूतों को फांसी पर लटका दिया। जिसके बाद भारत को आज़ादी हासिल हुई और इसके बाद ही इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। शहीदी दिवस के मौके पर हम ऐसे वीर सपूतों को नमन करते हैं।

वीर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव अपने देश के इतिहास में दर्ज वे नाम हैं जिनके बलिदान को जितनी बार नमन किया जाए वह कम होगा 23 मार्च को हुई इनकी शहादत ने देश के नौजवानों में आज़ादी के लिए जोश और जज्बे को भरने का काम किया था, इन वीरों को फांसी की सजा देकर अंग्रेज सरकार समझती थी के देश की जनता डर जाएगी और स्वतंत्रता की भावना को भूलकर विद्रोह नहीं करेगी किन्तु हुआ इसका उल्टा देश की जनता पर स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले इन सपूतों का ऐसा रंग चढ़ा के बच्चे -बच्चे ने आज़ादी के आंदोलन में कमर कस कर भागीदारी शुरू कर दी।

भगत सिंह  - Bhagat Singh Ka Jivan Prichay

28 सितम्बर 1907 को लायलपुर जिला के बंगा गांव में सरदार भगत सिंह का जन्म हुआ था। भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह और चाचा महान क्रन्तिकारी थे। वे भी कई बार जेल जा चुके थे। लाहौर मामले से पूर्व सेंट्रल एसेंबली में बम फेंकने के कारण इनको कालापानी की सज़ा भी हुई थी। 24 वर्ष की अल्प आयु में ही भगत सिंह को फांसी दे दी गयी थी।

शिवराम हरि राजगुरु - Rajguru Essay

24 अगस्त, 1908 को पुणे जिले के खेड़ा गांव में इनका जन्म हुआ था। राजगुरु के क्रन्तिकारी मन में देश के लिए मर मिटने का जज्बा था। चंद्रशेखर उनके सबसे विश्वसनीय क्रांतिकारी थे। राजगुरु को सितम्बर 1929 में पुणे से गिरफ्तार किया गया था। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। इन्होने जेपी सांडर्स की हत्या करने में भगत सिंह और राजगुरु का पूरा साथ दिया।

सुखदेव थापर  - Sukhdev Thapar 

15 मई 1907 को लुधियाना में सुखदेव का जन्म हुआ। तीन वर्ष की अल्प आयु में उनके पिता जी का देहांत हो गया था। घर  लोगों की देख -रेख में सुखदेव थापर का बचपन बीता। सुखदेव को बम बनाने के तरीके में महारत हासिल थी। सुखदेव हमेशा अपनी जरूरतों को दरकिनार कर  साथियों की जरूरतों को पहले पूरा करते थे।
यह भी पढ़ें - - सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय

SHARE THIS

Author:

EssayOnline.in - इस ब्लॉग में हिंदी निबंध सरल शब्दों में प्रकाशित किये गए हैं और किये जांयेंगे इसके इलावा आप हिंदी में कविताएं ,कहानियां पढ़ सकते हैं

0 comments: